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2 years agoहंसते हुए मैंने कुलवीर से पूछा, ये नौकरी कब लगेगी ... ये बंजर जमीन की किस्मत कब जगेगी... उसने हाथ में रखे मोबाइल का डाटा ऑफ कर दिया ... हाथ माथे पे गुस्सा सिकन पर धर दिया... क्यूं ऐसी बात से जी जलाते हो, तुम डिग्री को आग क्यूं नहीं लगाते हो.. बचपन का बलिदान लेके, आधी ज़िन्दगी इसे देके, हर वक्त मन पर भारी बोझ लिए, गम - ओ- जहर, बाप का गुस्सा पिए, एग्जाम हॉल में घड़ी की सुईओ से होड़ करके, दिमाग बेतुकी बातों से भर के, हर जागता मरा सबूत साइंस को बता कर, जोड़ घटाव से फक्शन टिकनोमेट्री का टोटका भिड़ा कर, कभी रात को देर, कभी सुबह जल्दी जाग कर, डंडों के निशान हाथों पे लिए में कैसे ये कर सकता था, में आधी ज़िन्दगी आग के हवाले कैसे मड़ सकता था.. कुलवीर ने चेहरे से हाथ हटाया, जोर का ठहाका लगाया, किस वहम में हो मियां कोनसी ज़िन्दगी की बात करते हो, वो जो सुबह नींद से लड़ कर गरम पानी के लिए मर कर, लाश बैग की उठा कर, टूटी चप्पल में कील फसा कर, पैंट पर जमी सियाही को थूक से मिटाने की जहमत, बाप की २ रुपए की रहमत, भीख कापी की की काम देखकर पूरा हो पाए, टीचर रास्ते में मर जाए पर स्कूल ने आने पाए, शाम को फिर खेत की और की दौड़, घास वक्त से पहले ला.. भैंसो को तालाब पर छोड़, इसे जिंदगी नहीं गुलामी कहते है, इस डिग्री के भी यही फायदे है, जेहन में गुलामी भरी है खुद को कुछ करने में डर लगता हैं, हर इंसान यहां दूसरो की भीख पर पलता और मरता है ...तुम मेरी सलाह लो, डिग्री जला दो.. हसंते हसंते डिग्री आग के हवाले करदी ... सरकारी नौकरी मिलेगी ये जहमत ही ख़तम करदी, हमने सरकार के सर से भार हटा दिया..... कुलवीर ने फिर भूखे रहो का नारा दिया ... हम फिर घर को हो लिए ....
