उसे उम्मीद थी कि आँखों की वो थकावट बिना कहे ही पढ़ ली जाएगी,
उसकी इस बेचैनी की वजह, बस चेहरा देखकर ही समझ ली जाएगी।
पर शायद उस तरफ जज़्बातों की गहराई का कोई अंदाज़ा ही नहीं था,
उस दिल में इन उदासियों के लिए जैसे कोई दरवाज़ा ही नहीं था।
जहाँ गिरते हुए आँसुओं को भी सिर्फ़ पानी की बूँद समझा जाता हो,
जहाँ सबसे गहरी तकलीफ़ों को भी महज़ एक आम सी बात कहकर परखा जाता हो,
वहाँ किसी के सामने दिल के पन्ने खोलकर बिखर जाने से बेहतर,
चुप रहना ही ठीक है ना?
जब अपने ही ज़ज़्बात अपनी ही नज़रों में, एक बेवजह सा सवाल बनने लगें,
जो रिश्ते कभी सुकून देते थे, जब वही दिल पर एक भारी सा बोझ लगने लगें,
तो अपनी हर तकलीफ़ को, एक मुस्कान के पीछे छुपाना ही ठीक है ना?
जहाँ लफ़्ज़ों को अपनी अहमियत की सफ़ाई देनी पड़े,
वहाँ बार-बार खुद को समझाते रहने से बेहतर, चुप रहना ही ठीक है ना?
'कितनी अजीब बात है ना, जिससे सबसे ज़्यादा इश्क़ हो,
उसी से सबसे बड़ा फ़ासला रखना पड़ता है,
उसे अपना मुकम्मल चाँद मानकर भी,
खुद अकेले ही इस अंधेरे में चलना पड़ता है।'
— vesper in verse
This story isn't about a specific person or gender, it’s about a silent phase so many of us have lived through ❤️🩹
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