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10 months ago
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Posted On: December 24th 2025, 06:05 am
एक कवि का जाना उसकी कविता का जाना नहीं होता।

शब्द ज़िंदा रहते है, गहरे अँधेरे में जहाँ से कुछ भी वापस नहीं आता । उनको लिखने के बाद शब्द जब लोगो तक पोहचते है तो वो बड़े होते जाते है । विनोद जी की एक ऐसी रचना जो मेरे लिए बड़ी होती ही गई है । और शायद होती ही जाएगी! उसको समझने का यह एक प्रयत्न है ।

संगीत लैला मजनू फ़िल्म से ‘तुम’ इरशाद कामिल ,नीलाद्री कुमार, जावेद अली
वॉइस ओवर और दृश्य मैंने किए है |

#vinodkumarshukla
#hindikavita
#tumkhadikyonho
Comments (13)
garvishthasinh 10 months ago

garvishthasinh

Amazing 😍😍😍😍

vishal_vyas_7777 10 months ago

vishal_vyas_7777

तुम्हारा इंतज़ार मेरे लिए ऐसा है जैसे तेज धूप के बाद फुलवाड़ी बारिश का ✍🏻🕊️

_mayank_shahi_ 10 months ago

_mayank_shahi_

👏👏

anshumansharad 10 months ago

anshumansharad

❤️❤️

frei.the_lone_star 10 months ago

frei.the_lone_star

तुम्हारे इंतज़ार की ताक़त इस पहाड़ से भी ज़्यादा मज़बूत लगती है.❤️

delcyshah_ 10 months ago

delcyshah_

❤️🤌🏼

chirag_solucky 10 months ago

chirag_solucky

इस कविता में उद्धत शब्दका तीन बार उपयोग किया गया है । और इस शब्द के दो अर्थ है। 1) शाब्दिक अर्थ: ‘उत्’ (ऊपर) + ‘धत्’ (धारण करना) — जो ऊपर उठा हुआ हो। या जो सीमाँ से ऊपर उठा हुआ हो। 2) अर्थ: अभिमानी, घमंडी या अहंकारी व्यक्ति। इन शब्दों को बारी बारी अलग तरीक़े से लगाने से नए आयाम बनते है, नए अर्थ पैदा होते है । आपका अर्थ जानने में रुचि रहेगी । नहीं अब मैं चलूँगी। यह सुनते ही जाने को कब से उद्धत यह पहाड़ है जिसकी चोटी पर एक घर मंदिर है और एक देवी स्त्री। वह जा रही मूर्ति थी। वह पत्थर की तरह कठोर नहीं थी। उसके चले जाने के समय से जाने को उद्धत यह पहाड़ किसी एक दिन से उसके आने की प्रतीक्षा में उद्धत पहाड़ है। - विनोद कुमार शुक्ला

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