3 months agoज्योतिष और धर्मशास्त्र में ग्रहण के संबंध में अनेक नियम और फल-विचार मिलते हैं, लेकिन हर ग्रहण को लेकर प्रत्येक व्यक्ति के लिए निश्चित रूप से “अब यह दुर्घटना होगी”, “यह बीमारी होगी”, “व्यापार में नुकसान होगा”, “परिवार में अनिष्ट होगा” जैसी बातें कहना तभी उचित है जब उस जातक की कुण्डली में ऐसे योग बनते हो। खगोलीय गति के कारण कई बार अमावस्या और पूर्णिमा को विश्व मे कहीं न कही ग्रहण हो सकता है परन्तु प्रभाव केवल वही प्रत्यक्ष रूप से होगा जहां वो दृष्टिगोचर हो। बाकी अप्रत्यक्ष या सूक्ष्म प्रभाव पूरी पृथ्वी, विभिन्न देशों के मध्य सम्बंध पर हो सकता है फिर भी अमावस्या और पूर्णिमा दोनों ही सनातन परंपरा में विशेष धार्मिक तिथियाँ हैं, और इन दिनों व्रत, स्नान, दान, जप, तर्पण आदि की अनेक परंपराएँ हैं। और हमारे ऋषियों ने इन दिनों दान जप तप अन्य धार्मिक कर्मो का विशेष महत्व बताया ही है।
