Posted On: July 22nd 2026, 02:31 am
नज़्म
इल्म गाहें हमारी मुस्तक़बिल
जहल-परवर हैं तीरगी-परवर
सुब्ह-ए-अहल-ए-ख़िरद से डरते हैं
मुल्क के शरपसंद सब हुक्काम
अहल-ए-फ़हम-ओ-हुनर से डरते हैं
हुक्म फ़िरऔन का ये आया है
हर इमारत को खंडहर कर दो
कर दो मिस्मार इल्मगाहों को
उस की हर ईंट मुन्हदिम कर दो
हर जगह जहल को बढ़ावा दो
सब के कानों में नफ़रतें भर दो
कुछ भी कर ले ऐ जाबिर-ओ-सफ़्फ़ाक
इल्म की लौ बुझा न पाएगा
गर मिटाएगा इस सितारे को
बन के ख़ुरशीद लौट आएगा
अंधे बहरों की ख़ामशी की जगह
गूँज अहल-ए-हुनर की ले लेगी
सख़्त तारीक रात हो फिर भी
इल्म की रौशनी तो फैलेगी
दरसगाहें हमारी मुस्तक़बिल
और ये सब उसी के रहज़न हैं
इल्मगाहों की क़दर क्या जाने
इल्म-ओ-तालीम के जो दुश्मन हैं
रज़ाए अख़्तर
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