Posted On: October 26th 2026, 02:07 pm
कुछ ख़याल, शब्द बने,
शब्द बने चंद पंक्तियाँ,
फिर एक के बाद एक
नया ख़याल जुड़ता गया,
और यूँ निखर आई यह कविता।
कुछ हफ़्ते पहले इसकी दो पंक्तियाँ लिखी थीं।
साझा कीं तो एक मित्र ने कहा, "यह मिसरा बस मिसरा बनकर रह गया, तो इसके साथ नाइंसाफ़ी होगी।"
उनकी बात दिल में बैठ गई,
और आज यह कविता आपके सामने है।
आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा। 🤍
génie
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