Posted On: November 1st 2026, 06:29 am
ख़ैर, आख़िर में…
ख़ैर, आख़िर में तू भी इक भगवान हो गया है,
बना के मुझको नास्तिक, तू ख़ुद ही खो गया है।
जिसे उम्र भर सिखाता रहा सब्र का सलीक़ा,
वो क्यूँ फिर सवालों से अब ख़फ़ा हो गया है।
महज़ इंसान में इंसान तलाशा है हमेशा ,
ये मज़हब यूँ दरमियाँ दीवार सा सो गया है।
हर ज़ुल्म को तूने क़िस्मत का नाम दे दिया,
मेरा यक़ीन तेरे जवाबों से फ़ना हो गया है।
मैंने पूछा कि भूख का मज़हब क्या होता है,
तेरा जवाब फिर सफ़हों में फ़ना हो गया है।
न सज्दा रहा, न दुआ, न कोई इल्तिजा,
मेरा यक़ीन तेरी चौखट से हवा हो गया है।
~🪷