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BHABHA & BHABHISA🤍 by @_dilips__
6
5 months ago
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loading... by @_dilips__
127
4 months ago
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कैसा होगा अगर आप कुछ पन्नों की सैर पर निकलें, और अंत तक पहुँचकर जानें कि अब आप, आप नहीं रहे।🙃

‘दरख़्त: एकांत का संगीत’
केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि गहरे अकेलेपन, प्रेम, स्मृति और आत्म-साक्षात्कार की एक सुरीली यात्रा है।
यदि आप भी एकांत में शब्दों का साथ ढूंढते हैं, तो यह काव्य संग्रह आपके लिए ही है। 🍂

#BookReview #HindiLiterature #PoetryCollection #Derakht #DileepSingh 

(BookRecommendation, UnfoldingThoughts, poetry, emotional, Kavita, Hindikavitayen, kavitasangrah, Hindi poetry, sunder kavitayen) by @_dilips__
4
10 hours ago
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Jo kitabon ka mood hoga, wahi padhenge! 🍂

बेहुनर @chaksspeare 
 अम्मू और अज्जू  @linguist_of_emotions 
दरख़्त: एकांत का संगीत  @_dilips__ 
प्रारंभ शब्द उद्गार - @kailashjangra24 
 हम फिर मिलेंगे - @therudraworld_5 

Are you a strict TBR planner or a chaotic mood reader this month? Comments mein batao! 👇

#HindiLiterature #OctoberTBR #BookstagramIndia #AestheticReads #UnplannedReads BookReels LiteratureLovers by @_dilips__
6
a day ago
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Some books stay with you long after you close them❤️

In kitabon ka Detailed Review & Breakdown aap mere page @unfoldingthoughts01 par dekh sakte hai 🍃

Kon si kitaab ka review aap sabse pehle padhna chahenge? Comments me  bataiye!

Do follow for more aesthetic book recommendations and reviews🌻❤️

#UnfoldingThoughts #BookReview #HindiLiterature #BookstagramIndia #AestheticReading BookRecommendations BookCommunity BookCollector LiteraryVibes BookReviewer A person holding three Hindi books in hand against a scenic outdoor background with palm trees during sunset or twilight. by @_dilips__
8
2 days ago
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सामान लाद जाना चाहिए

सामान लद जाना चाहिए अब,
यह ठिकाना मेरा घर नहीं।
यहाँ मुझे हर रोज़
कामयाबी से तौला जाता है, मैं मगर कमतर नहीं।

अपनी नज़रों में अब भी ऊँचा हूँ,
चाहे जग ने नाकारा कहा।
निकलना है इस घुटन से वहाँ,
जहाँ मैं और मेरे सपने
हमसफ़र बन,
अपनी छोटी-सी दुनिया में
सुकून का एक आसमाँ लिखें।
 ~द्रूम

#hindiwriter 
#hindikavi by @_dilips__
2
6 days ago
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उसकी आँखों ने अदालत भी खुद लगाई थी,

वही मुजरिम, वही क़ाज़ी, वही सज़ा सुनाता था।

लब ख़ामोश रहे, फिर भी इल्ज़ाम लिखे उसने,

वो निगाहों से हर इक जुर्म का पता करता था।

मैं सफ़ाई भी दूँ तो किस ज़ुबाँ में आख़िर दूँ,

वो तो ख़ामोशी को भी मेरे ख़िलाफ़ गवाह करता था।

उसके फ़ैसलों में दलीलों की जगह कम निकली,

वो जो महसूस करे, बस वही ख़ुदा करता था।

अजब इंसाफ़ है उसके इश्क़ की महफ़िल में,

जो दिल से हार भी जाए, वही फ़तह करता था।
 - द्रूम by @_dilips__
0
7 days ago
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डॉक्टर

जब ईश्वर

किसी की साँस तक

समय पर नहीं पहुँच पाता,

वह

एक डॉक्टर के हाथों में

थोड़ा-सा भरोसा रख देता है।

शायद इसलिए—

हर अस्पताल में

दवाइयों से पहले

उम्मीद काम करती है।

                ~द्रूम

#healthtips 
#doctor 
#mbbs 
#medicalstudent by @_dilips__
0
7 days ago
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बस
उधर चलता रहूँगा
जिधर से लौटते हुए लोग
थोड़े अच्छे दिखाई देते हैं।

पेड़ से मिलने का
सबसे ठीक समय
उसकी छाँव नहीं,
उसकी धूप होती है।

नदी को
किनारे पर नहीं,
अपने भीतर जगह देनी पड़ती है।

मैं जिन लोगों से मिलूँगा,
उन्हें याद भी नहीं रहेगा
कि हम मिले थे।

बस इतना हो
उनके अकेलेपन में कभी
मेरी चुप्पी की एक जगह बची रहे।

अगर मेरे होने का
कोई अर्थ निकले,
तो वह
किसी के रास्ते में नहीं,
किसी के लौटने में मिले।
 ~द्रूम by @_dilips__
1
7 days ago
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जिसे तख़्त-ए-ख़्वाब पर बिठाकर तूने अपना जहाँ समझा,

वही इक रोज़ रुख़्सत होगा, बस इतना सा गुमाँ रखनाl

जो आज तेरी धड़कन में है, कल यादों में ढल जाए,

हर इक लम्हा फ़ानी है, सीने में ये निशाँ रखना।

कुछ रिश्ते रेत के जैसे हैं, मुट्ठी भर हाथों में ठहरें,

ज़ोर से थामेगा जितना तू, उतना उन्हें रायगाँ रखना।

हर शख़्स मुकम्मल तेरा हो, ये दस्तूर-ए-दुनिया कब है,

कुछ हिस्से तन्हा जीने को, अपने पास यहाँ रखना।

जो टूट के फिर सँवर जाए, दर्द उसका उस्ताद ठहरा,

हर ज़ख़्म को दुश्मन मत समझ, कुछ को मेहरबाँ रखना।

जब सब कुछ छूट ही जाना है इस गर्दिश-ए-दौराँ में,

खुद को खुद से मत खो देना, बस इतना सा ध्यान रखना।

                                ~द्रूम

#poet by @_dilips__
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8 days ago
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इधर ज़रा-सा देख लो,
ऐ ज़िंदगी—
तुम्हारी भागती हुई रफ़्तार से छूट गया हूँ मैं,
कहीं पीछे, धूल और शोर के बीच।

तुमने अक्सर मेरे चेहरे पर
एक शांत आदमी देखा होगा,
पर उस शांति के नीचे
हर रोज़ एक युद्ध होता है।

मैं नहीं चाहता
कि मेरे टूटने की आवाज़
उन दीवारों तक पहुँचे
जिन्होंने मेरे नाम से भरोसा बाँध रखा है।
इसलिए हर रात
तकिए में मुँह छिपाकर
मैं अपने हिस्से का तूफ़ान
धीरे-धीरे निगल जाता हूँ।

समाज कहता है—
“पुरुष हो, मज़बूत रहो।”
जैसे मज़बूती का अर्थ
पत्थर हो जाना हो।
वे नहीं जानते,
पत्थर भी घिसते हैं,
उनमें भी दरारें पड़ती हैं,
बस वे चीख नहीं पाते।

मेरी उलझनों की ओर देखो—
इन अधूरी किश्तों,
इन बढ़ते खर्चों,
इन मरते सपनों की ओर।
देखो उन इच्छाओं को
जिन्हें मैंने
बच्चों की फ़ीस के नीचे दबा दिया,
राशन के थैलों में बाँध दिया।
देखो उन शब्दों को
जो हर बार गले तक आकर लौट गए,
क्योंकि रोना
मुझे कभी सिखाया ही नहीं गया।

मैं थक गया हूँ, ज़िंदगी।
हर मोड़ पर ख़ुद को साबित करते-करते,
हर रिश्ते में
अपनी ज़रूरत आख़िर में रखते-रखते।

एक बार—
बस एक बार
मेरे कंधों पर रखे
इन अदृश्य पहाड़ों को देखो।
मैं शिकायत नहीं कर रहा,
बस चाहता हूँ
कि तुम मेरी चुप्पी को
कमज़ोरी मत समझो।
क्योंकि जो आदमी
सबके लिए छत बना रहता है,
अक्सर वही
बारिश में सबसे ज़्यादा भीगता है।

अगर देख सको तो—
मैं अब भी खड़ा हूँ,
पर पहले जैसा नहीं हूँ।
मेरे भीतर बहुत कुछ
धीरे-धीरे मर चुका है,
और जो बचा है—
वह सिर्फ़ जिम्मेदारियाँ नहीं,
थोड़ी-सी उम्मीद भी है।

इसलिए आया हूँ तुम्हारे पास,
अपना दुःख लेकर,
अपनी उलझनें लेकर—
कि शायद तुम सुनो।
क्योंकि दुनिया ने
हर बार फैसला सुनाया है,
आज पहली बार
मैं सिर्फ़ सुना जाना चाहता हूँ।
— द्रूम by @_dilips__
2
9 days ago
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नज़र

उसकी नज़र से गिरना भी अजीब हादसा था,
टूटा तो मैं नहीं था, मगर बिखर गया।

उसकी नज़र में डूब के जाना ये राज़ भी,
कुछ लोग बोलकर नहीं, ख़ामोश मारते हैं।

उसकी नज़र का ज़िक्र लफ़्ज़ों में क्या करूँ,
वो ख़ामोशी से भी क़यामत कह गई।

वो देखती रही और मैं बिखरता रहा,
अजब था हादसा—शोर भी नहीं हुआ।

उसकी नज़र ने आज फिर ऐसा असर किया,
मैं ख़ुद में था मगर ख़ुद मेरा रहा नहीं।

उसकी नज़र ने यूँ मिरी ख़ामोशी पढ़ ली,
जैसे किताब-ए-दिल पे कोई हाशिया लिखा हो।

उसकी नज़र पड़ी तो सज्दे में दिल गया,
मैं उसको देखता था, ख़ुदा दिखने लगा।

उसने जो देखा मुझको करम की नज़र से यूँ,
मिट्टी का जिस्म था, मगर नूर हो गया।

उसकी नज़र में डूबा तो ये राज़ खुल गया,
दरिया वही था, डूबने वाला मैं ही था।

उसकी निगाह क्या थी, फ़क़त एक रौशनी,
अंदर के सब अँधेरों का जनाज़ा उठ गया।

वो देख ले तो ज़िक्र भी ख़ामोश हो उठे,
कुछ राब्ते अज़ान से पहले के भी तो हैं।
 ~द्रूम by @_dilips__
1
9 days ago
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