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कला !! साहित्य !! संस्कृति !!
प्राणों के स्पंदन से प्रस्फुटित चेतना
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मृगतृष्णा

दौड़े बालु-प्रसार-मध्य मृग हा! तापेन दग्धो वने,
प्यासा व्याकुल नीर-आश-वश में, पाषाण-पन्थे घने।
"रोको वेग, सखी तरंगिणि! यहाँ, पीड़ा मिटाओ घनी,
सूखा कण्ठ, विशीर्ण प्राण, सुन लो, हे दिव्य-संजीविनी!"

दौड़े बालु-प्रसार-मध्य मृग हा! तापेन दग्धो वने,
रे सीधे मृग! दौड़ व्यर्थ करता, मैं बालुका में जली।
ना कोई जल-बिन्दु है निकट रे, सूखा पड़ा रेणुका,
तेरी दृष्टि-प्रपंच-रश्मि-रचना, आलोक की मालिका।

दीखे वारि-तरंग-नीर-लहरी, झूठा कहूँ कैसे मैं?
मेरी प्यास पुकारती विकल हो, तू वारि दे प्यास में!
तू भासे जल-पूर्ण-शांत-सरिता, क्यों भागती दूर है?
पाना चाहत नीर-पूर-अमृता, सूखा हिया चूर है

तेरी ही तृषिता अपार-रचना, अस्तित्व देती मुझे,
तू ज्यों-ज्यों बढ़ता समीप, उतना विस्तार पाऊँ घना।
खोजे तू बहता विशुद्ध जल रे! अंतः-प्रवाहे नहीं,
माया-मोह विहाय शीतल बने, संताप-ज्वाला मिटे!

बालु-प्रसार-मध्य: मरुस्थल, तापेन: धूप, दग्धो (दग्ध): झुलसा हुआ, नीर-आश-वश: जलग्रहण-कामना, पाषाण-पन्थे: पथरीला-मार्ग, तरंगिणि: नदी, विशीर्ण: जर्जर, दिव्य-संजीविनी: प्राणरक्षक, बालुका: रेत, जल-बिन्दु: जलबूँद, रेणुका: धूलिकण, दृष्टि-प्रपंच: दृष्टिभ्रम, रश्मि-रचना: किरणजाल, आलोक की मालिका: प्रकाशमाला, वारि: जल, लहरी: तरंग, भासे: प्रतीत, नीर-पूर-अमृता: अमृतजल, हिया: हृदय, तृषिता: प्यास, अपार-रचना: मनोविस्तार, अंतः-प्रवाहे: अंतर्मन-धारा, विहाय: त्यागकर, संताप-ज्वाला: वेदनाग्नि।

- भारमल गर्ग"विलक्षण" by @bharmalgarg
4
11 hours ago
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सदा-ए-इंक़लाब

आज ख़ामोशी-ए-दौरां को सदा देनी है
हर तड़पती हुई चीख़ों को ज़बाँ देनी है

बेच डाले हैं सवेरे कई नीलामों में
क़त्ल करते हैं वो सपनों को भरे आमों में
ज़हर घोला है जवानी के हसीं जामों में
आग अब ज़ुल्म के ऐवान को जा देनी है

तख़्त पर बैठ के जो रोज़ मुकर जाते हैं
झूठ के जाल से इतिहास को भर जाते हैं
फ़ैसला करके हवाओं से गुज़र जाते हैं
हर फ़रेबी को सज़ा अब तो कड़ी देनी है

छीन लेते हैं जो मज़दूर की आधी रोटी
आँकते हैं जो हर एक ख़ून की क़ीमत छोटी
शाख़ तहज़ीब की हर गाँव में है अब टूटी
अब तो ज़ालिम को सज़ा एक कड़ी देनी है

तुम समझते थे कि ख़ामोश रहेंगे हरदम
अब तो सड़कों पे उमड़ आया अवामों का गम
फूँक डालेगा ये तख़्तों को उबलता परचम
ज़ालिमों को यहाँ अब मात ज़रा देनी है

ताज़-ओ-तख़्त-ओ-दिरम-ओ-ज़ोर-ओ-सितम टूटेगा
दौर-ए-बेदाद का हर एक भरम टूटेगा
ज़ुल्म की राह में अब रुक न क़दम टूटेगा
अब नए सूरज-ए-फ़र्दा को ज़िया देनी है

- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण" by @bharmalgarg
20
a month ago
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राजस्थान साहित्य अकादमी “मधुमती” 
में आठ कविताएँ प्रकाशित… by @bharmalgarg
15
8 months ago
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राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा प्रकाशित पत्रिका 'मधुमति' के अंक ६ में षट् कविताएँ प्रकाशित हुई हैं। यह अंक वर्तमान में साहित्यिक जगत में उपलब्ध है। by @bharmalgarg
30
a year ago
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गंगा-तट का अमर विरह by @bharmalgarg
12
a year ago
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अंतरतम का अग्निपथ 🌸

वाराणसी के घाटों पर प्रातःकालीन सूर्य की प्रथम किरण जब गंगा के जल को स्पर्श करती, तो ऐसा प्रतीत होता मानो भगवान शंकर अपनी जटाओं से अमृत की धारा प्रवाहित कर रहे हों। किन्तु उस विशेष प्रभात में, पंडित विश्वनाथ की दृष्टि गंगा के तरंगों में नहीं, अपितु अपने हृदय के शून्य में अटकी थी। वेद-वेदांग के मर्मज्ञ, शास्त्रार्थ में अजेय इस पंडित के वक्षस्थल में अब केवल एक टूटे हुए सितार की ध्वनि गूँज रही थी। मंदिर के विराट शिखर के सम्मुख खड़े वे अपनी छाया से प्रश्न कर रहे थे—"क्या यह चोटी में बँधा रुद्राक्ष माला का टूटना उसी दिन का संकेत था, जब महादेवी ने प्रथम बार इस ओर दृष्टिपात किया था?" 

महादेवी... नाम ही उनके अस्तित्व का सार था। काशी की वह नृत्यांगना जिसके चरणों की थाप पर स्वयं नटराज प्रसन्न होकर तांडव करने लगते। जिस दिन वह संकीर्ण गलियों से गुज़रीं, उनके पायल की मधुर झंकार ने पंडित के वेदोच्चारण को मध्याकाश में लटका दिया। पलक झपकते ही, महादेवी की चुनरी का कोना हवा में लहराया और पंडित के कंठ से निकलता "ॐ नमः शिवाय" का मंत्र उसी लहर में विलीन हो गया। उस क्षण दो नदियों का संगम हुआ—एक की धारा में वेदों का ज्ञान, दूसरी की लहरों में रस की सघनता। दोनों अपने उद्गम को विस्मृत कर मिलन के सागर में डूब गए। 

किन्तु काशी का प्रेम सरलता से फलित नहीं होता। यहाँ तो प्रत्येक प्रेमी को विरह की अग्निपरीक्षा में उतरना पड़ता है। जिस निशीथिनी में महादेवी ने अपनी अँगूठी पंडित की हथेली पर रखी, उसी क्षण विश्वनाथ मंदिर के घंटे स्वतः ही विषादपूर्ण स्वर में गूँज उठे। अँगूठी के नीलम में समाया चंद्रमा काँप गया, मानो उसने श्वेत वस्त्र ओढ़ लिए हों। पंडित ने महादेवी की करकमल पर एक श्लोक अंकित किया— "यदि काल के कपटजाल में बिछुड़ जाऊँ, तो इस नीलम में मेरे प्राणों का स्पंदन ढूँढ़ लेना।"

विरह की वे दीर्घ रातें... जब महादेवी मंदिर के उस स्तंभ से आलिंगनबद्ध हो जातीं, जहाँ पंडित का साया अब भी अंकित था। वह अँगूठी को प्रतिदिन छत पर रख देतीं, जहाँ चंद्रिका उसे स्नान कराती। किन्तु एक अमावस्या की घोर निशा में, चंद्रमा ने नीलम को अपने हृदय में समाहित कर लिया। अँगूठी शून्य हो गई। ठीक उसी क्षण, दक्षिण के मठ में बैठे पंडित ने देखा—शास्त्रों की पुरातन पांडुलिपि पर लिखे अक्षरों के स्थान पर महादेवी के अश्रु बह रहे थे। उन्होंने मषीपात्र को पृथ्वी पर पटक दिया—मानो अपने ही हृदय का मुहर भंग कर दिया हो।

आगे जारी टिप्पणी... by @bharmalgarg
8
a year ago
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