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चुनिंदा कविताओं से मेलजोल का १२/७२वाँ दिन ! 

निर्मला पुतुल जी की यह कविता इस समाज के पुरुषों से सवाल करती है । सवाल स्त्रीत्व और स्त्री मन से जुड़े हुए । स्त्री जो हमारी आपकी मां हैं , बेटी है, बहन है , प्रेमिका और पत्नी हैं, क्या आप उसके मन को जान सके हैं? 
निर्मला जी की कविताओं में स्त्री विमर्श ,आदिवासी स्त्री जीवन से जुड़े संघर्ष और क्रांति दीख पड़ती है । 

ऐसी ही कविताओं और कवि एवं कवियित्रियों के बारे में जानने के लिए हमसे जुड़े रहें ! 

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13
16 hours ago
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चुनिंदा कविताओं से मेलजोल का ११/७२वाँ दिन ! 

प्रेमिका के संग बिताये प्रेम के किसी एक क्षण को शब्दों में पिरोती श्री धर्मवीर भारती जिनकी यह कविता उस क्षण को , उस प्रेम को सदा सदा के लिए अमर कर देती है । भारती जी की काव्य रचनाओं का केंद्र प्रेम और प्रकृति के साथ साथ पुराने और नए मानवीय मूल्यों के संघर्ष से पैदा होने वाला तनाव और बेचैनी तथा अस्तित्वगत प्रश्न हैं । 
श्री भारती जी की प्रमुख कृतियां हैं "गुनाहों का देवता ", " सूरज का सातवां घोड़ा " ।

ऐसी कविताओं और कवियों के बारे में जानने के लिए हमसे जुड़े रहें ! 

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16
3 days ago
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चुनिंदा कविताओं से मेलजोल का १०/७२वाँ दिन ! 

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में जन्मे श्री रमाशंकर यादव " विद्रोही "जी का जीवन शुरुआती दिनों में घर पर ही बीता और जब शादी हुई तो उनकी पत्नी ने उनसे दिल्ली जाकर पढ़ाई करने का आग्रह किया । जेएनयू में दाखिले के पश्चात छात्र राजनीति में आए और आंदोलन और राजनीति में यूं डूबे कि पढ़ाई भी पूरी न कर सके । 
बाक़ी जीवन परिवार से इतर जेएनयू में बीता । कैंपस के जंगलों में रहते , कविताएं कहते और तमाम छात्र आंदोलनों को अपनी आवाज़ देते वह कैंपस ही उनका परिवार हो गया । विद्रोही का जीवन अत्यंत फक्कड़ और अनौपचारिक था। वे कैंपस के पेड़ों, ढाबों और छात्र-आंदोलनों के बीच रहते और अपनी कविताएँ काग़ज़ पर लिखने के बजाय स्मृति से सुनाते थे। उनकी कविताएँ छात्रों और आंदोलनों के बीच मौखिक परंपरा के माध्यम से फैलती रहीं।
उनकी कविता में शोषण, जाति, स्त्री की स्थिति, धार्मिक रूढ़ियाँ, सत्ता, असमानता और आम आदमी के संघर्ष जैसे व by @karm__pathak
18
5 days ago
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चुनिंदा कविताओं से मेलजोल का ९/७२वाँ दिन ! 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय की उपज और प्रतापगढ़ , उत्तर प्रदेश में जन्मे मेरे प्रिय श्री दीपक मिश्रा (@recluse__monk ) जी की यह कविता जीवन के संघर्षों को स्वीकार करना सिखाती है । यह कविता आपको एक दर्पण देती है जिसमें आप पीड़ा , सुख और दुख के साथ स्वयं को रोज़ाना देखते हैं और सीखते हैं कि दुख और सुख साथ में कैसे भोगना होता है । 
दीपक भैया की कविताओं में जीवन के संघर्ष , प्रेम और राजनैतिक टिप्पणी देखने को मिलती है । 

ऐसी ही कविताओं और कवियों के बारे में जानने के लिए जुड़े रहें हमसे । 

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20
6 days ago
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चुनिंदा कविताओं से मेलजोल का ८/७२वाँ दिन !

16 जनवरी 1939 को ग्वालियर, मध्य प्रदेश में जन्मे श्री नरेश सक्सेना जी समकालीन हिंदी कविता के उन विशिष्ट कवियों में हैं, जिनकी कविता कम शब्दों में जीवन की बड़ी सच्चाइयों को व्यक्त करती है। पेशे से इंजीनियर रहे नरेश सक्सेना की पहली कविता 1958 में प्रकाशित हुई।
प्रस्तुत कविता में नरेश जी मन की चंचलता का वर्णन करते नज़र आते हैं । वे साधारण बिम्बों पर अपने ख़्याली घोड़े दौड़ाते हर पाठक के मन में सहजता से प्रवेश कर जाते हैं । नरेश जी कितनी आसानी से मन के विचलित भावों को कह जाते हैं ,उसकी ना - ठौरूकी को बयाँ कर जाते हैं !

ऐसी ही चुनिंदा कविताओं को सुनने और कवियों के बारे में जानने के लिए बने रहें। 

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14
7 days ago
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चुनिंदा कविताओं से मेलजोल का ७/७२वाँ दिन !

पुनीत शर्मा (@puneetvuneet ) की यह कविता जीवन के तमाम संघर्षों , दुखों और आपदाओं को स्वीकार करते हुए जीवन के रथ के पहिये को आगे बढ़ाते रहने का संदेश प्रेषित करती है | 

पुनीत जी समकालीन आधुनिक हिंदी कविता जगत के एक युवा कवि हैं और इनकी कविताओं के सागर में भाव बहुत सरलता से तैरते नज़र आते हैं । 
और कवि की काव्य साधना तभी साध्य हो पाती है जब वह आम जनता तक पहुंचे और उनको समझ आये । 

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8 days ago
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चुनिंदा कविताओं से मेलजोल का ६/७२वाँ दिन !

हिंदी की छायावादी काव्यधारा के मुख्य चार स्तंभों में से एक श्री जयशंकर प्रसाद जी (1889-1937) का जन्म काशी के एक समृद्ध वैश्य परिवार में हुआ।
प्रसाद जी की रचनाओं का सागर तत्सम शब्दों से भरा हुआ है या यूं कहें कि उनकी खड़ी भाषा संस्कृतनिष्ठ और गंभीर होने के साथ भावपूर्ण है । प्रसाद जी के काव्य में मनोविज्ञान , प्रेम , प्रकृति -सौंदर्य और दार्शनिक चिंतन का समन्वय देखने को मिलता है । 
प्रसाद जी की प्रस्तुत कविता से मेरा परिचय मेरी कक्षा १० की हिंदी ncert की पुस्तक से हुआ । और यह परिचय ही वह कारण बना कि मेरे जीवन की पोटली में तमाम चीजों के साथ साहित्य भी जुड़ गया ।

उनकी प्रमुख काव्य कृतियों में ‘कामायनी’, ‘आँसू’, ‘लहर’ और ‘झरना’ उल्लेखनीय हैं। कामायनी उनकी काव्य-साधना की सर्वोच्च उपलब्धि मानी जाती है। 

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9 days ago
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चुनिंदा कविताओं से मेलजोल का ५/७२वाँ दिन !

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (1927–1983)
हिंदी के नई कविता आंदोलन के प्रमुख कवि, लेखक और पत्रकार। जन्म 15 सितंबर 1927, बस्ती (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उन्होंने पत्रकारिता के साथ-साथ कविता, कहानी, नाटक और बाल-साहित्य में भी उल्लेखनीय लेखन किया।

सर्वेश्वर जी की कविता में आम आदमी का जीवन, सामाजिक विसंगतियाँ, राजनीतिक विडंबनाएँ, प्रेम, अकेलापन और व्यवस्था के प्रति प्रतिरोध एक साथ दिखाई देते हैं। उनकी भाषा सहज, बोलचाल के निकट और प्रतीकों से समृद्ध है। वे कविता को केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि अपने समय से संवाद और सवाल करने का माध्यम बनाते हैं।

उनकी प्रमुख कृतियों में ‘काठ की घंटियाँ’, ‘बाँस का पुल’, ‘एक सूनी नाव’, ‘गर्म हवाएँ’ और ‘जंगल का दर्द’ उल्लेखनीय हैं। उनकी चर्चित कविताओं में ‘कुआनो नदी’, ‘भेड़िया’, ‘लीक पर वे चलें’ और ‘काठ की घंटियाँ’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

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10 days ago
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चुनिंदा कविताओं से मेलजोल का ४/७२वाँ दिन !

एकांत और उदासी , दोनों के दूसरे से बहुत निकटस्थ हैं । परंतु इसी विचार का एक दूसरा पक्ष यह है कि एकांत को उदासीनता और उदासीनता को एकांत की आवश्यकता नहीं पड़ती जब समय वैसा हो और उदासीनता ही ,दुख ही तो सबको मांजता है , यदि उदासीनता न हुई तो फिर सुख और कहक़हे का क्या अर्थ ? 
अज्ञेय जी की यह कविता इन्हीं पक्षों को , इन्हीं बिंदुओं को टटोलती है । 

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11 days ago
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चुनिंदा कविताओं से मेलजोल का ३/७२वाँ दिन ! 

केदारनाथ सिंह (1934–2014) हिंदी की आधुनिक कविता के उन महत्वपूर्ण कवियों में हैं जिन्होंने साधारण जीवन और रोज़मर्रा की वस्तुओं में छिपे असाधारण अर्थों को अपनी कविता का विषय बनाया। उनका जन्म 7 जुलाई 1934 को उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के चकिया गाँव में हुआ। गाँव की मिट्टी, लोक-स्मृतियाँ और ग्रामीण जीवन उनके काव्य-संसार की आधारभूमि बने, लेकिन उनकी कविता केवल गाँव की कविता नहीं है—वह गाँव से शहर तक फैलते हुए उस मनुष्य की कविता है जो बदलते समय में अपनी स्मृतियों, भाषा और संवेदनाओं को बचाए रखना चाहता है।

केदारनाथ सिंह नई कविता की उस पीढ़ी के कवि हैं जिसने कविता को बड़े-बड़े घोषणापत्रों से निकालकर रोटी, पानी, पेड़, बाघ, नमक, घर और भाषा जैसी साधारण चीज़ों के बीच खोजा। उनकी कविता में लोक और आधुनिकता, गाँव और शहर, स्मृति और वर्तमान का एक निरंतर संवाद दिखाई देता है। उनकी भाषा सहज और बोलचाल के निकट है, लेकिन इसी सहजतके भीतर गहरी दार्शनिकता और मानवीय संवेदना छिपी रहती है।
उनके प्रमुख काव्य-संग्रह हैं— ‘अभी बिल्कुल अभी’, ‘जमीन पक रही है’, ‘यहाँ से देखो’, ‘अकाल में सारस’, ‘उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ’ तथा ‘तालस्तॉय और साइकिल’। ‘बाघ’, ‘अकाल में सारस’, ‘रोटी’, ‘पानी’, ‘पेड़’ और ‘यहाँ से देखो’ उनकी चर्चित कविताएँ हैं।
‘अकाल में सारस’ के लिए उन्हें 1990 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और 2013 में हिंदी साहित्य के सर्वोच्च सम्मानों में से एक, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
केदारनाथ सिंह की कविता का सबसे सुंदर पक्ष शायद यही है कि वह बड़ी बात को छोटी चीज़ में और मनुष्य के बड़े संकट को उसके रोज़मर्रा के जीवन में खोजती है। उनकी कविता में शब्द केवल अर्थ नहीं देते, वे स्मृति, मिट्टी और मनुष्य की उपस्थिति को भी बचाए रखते हैं।
“केदारनाथ सिंह को पढ़ना, साधारण चीज़ों को एक बार फिर नए अर्थों में देखना है।” by @karm__pathak
33
12 days ago
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चुनिंदा कविताओं से मेलजोल का २/७२वाँ दिन !

गजानन माधव मुक्तिबोध (1917–1964) — हिंदी साहित्य के उन महत्त्वपूर्ण कवियों में हैं, जिन्होंने आधुनिक हिंदी कविता को आत्मसंघर्ष, सामाजिक यथार्थ और वैचारिक बेचैनी की नई भूमि दी। उनका जन्म 13 नवंबर 1917 को श्योपुर, मध्य प्रदेश में हुआ। वे कवि, कहानीकार, आलोचक और निबंधकार के रूप में हिंदी साहित्य में विशिष्ट स्थान रखते हैं।

मुक्तिबोध की कविता में मध्यवर्गीय जीवन का द्वंद्व, सामाजिक विषमता, राजनीतिक चेतना, आत्मालोचन और मनुष्य के भीतर चलने वाला संघर्ष बार-बार दिखाई देता है। उनकी भाषा जटिल होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली है और उनकी काव्य-दृष्टि में फैंटेसी, प्रतीक, बिंब तथा आत्मसंवाद का विशिष्ट प्रयोग मिलता है।

उनकी प्रमुख कविताओं में ‘अँधेरे में’, ‘ब्रह्मराक्षस’, ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’, ‘भूल-गलती’, ‘लकड़ी का बना रावण’ और ‘एक अंतर्कथा’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

मुक्तिबोध की कविता केवल बाहर के अँधेरे को नहीं देखती—वह मनुष्य के भीतर छिपे अँधेरे से भी उसका सामना कराती है। शायद इसीलिए उनकी कविता आज भी उतनी ही बेचैन, प्रश्नाकुल और प्रासंगिक लगती है।

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29
13 days ago
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चुनिंदा कविताओं से मेलजोल का १/७२वाँ दिन !

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (7 मार्च 1911 – 4 अप्रैल 1987) हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि, कथाकार, निबंधकार, संपादक और प्रयोगवादी साहित्यकार थे। उनका जन्म कुशीनगर, उत्तर प्रदेश में हुआ।

अज्ञेय की कविता में आत्म-अन्वेषण, प्रकृति, प्रेम, अस्तित्व-बोध, स्वतंत्रता और आधुनिक मनुष्य की आंतरिक बेचैनी प्रमुख रूप से दिखाई देती है। उनकी काव्य-भाषा बिंबात्मक, प्रतीकात्मक और प्रयोगधर्मी है। वे हिंदी में प्रयोगवाद और नई कविता के विकास के प्रमुख साहित्यकारों में गिने जाते हैं।

उनकी चर्चित कविताओं में ‘हरी घास पर क्षण भर’, ‘नदी के द्वीप’, ‘असाध्य वीणा’, ‘यह दीप अकेला’ और ‘कलगी बाजरे की’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

अज्ञेय ने केवल कविता ही नहीं, बल्कि उपन्यास, कहानी, निबंध, यात्रा-वृत्तांत और संपादन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण लेखन किया। उनके प्रमुख उपन्यास ‘शेखर: एक जीवनी’ और ‘नदी के द्वीप’ हैं।

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56
14 days ago
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