3 years agoमेरे अंदर का लेखक मन कई बार इतना स्वार्थी हो जाता है कि मै पूरी तरह जीते रहना छोड़ के लिखना भी शुरू कर देता हूं। उस एहसास में ख़ुद को, घुल के जीने देने के बदले, महसूस करते हुए लिखने का चुनाव कर लेता हूं। मेरा एक हिस्सा जी रहा होता है, और दूसरा हिस्सा लिख रहा होता है। शायद ये लेखक मन मुझे संभालने कि कोशिश कर रहा होता है कि मै पूरी तरह ऐसे ना खो जाऊं कि वापस लौटना मुश्किल हो जाए। या फिर मैं कुछ नया सा महसूस करके नया सा लिख देने के उत्साह में ज्यादा मशगूल हो जाता हूं।
