Posted On: July 7th 2026, 12:35 pm
माँ, तुम्हारे बिना जीना मैं कभी सीखना नहीं चाहता था।
दिल्ली का यह मकान बहुत बड़ा लगता है मैं एक कमरे से दूसरे कमरे में प्रेत जैसा मँडराता रहता हूँ मगर मुझे तुम कहीं नज़र नहीं आती हो।
दरवाज़े पे कोई दस्तक होती है तो लगता है जैसे दूसरी तरफ़ तुम खड़ी हो मगर हर बार कभी दूध वाला, अख़बार वाला तो कभी पता पूछता अनजान व्यक्ति मिलता है। मुझे लगता है जैसे उनकी शक्ल लेके तुम मुझसे मिलने चली आई हो इस भ्रम में मैं हर बार किसी अनजान को गले लगा बैठता हूँ तुम्हें पता है माँ, किसी अनजान को गले लागने में भी एक प्रकार का अपनापन महसूस होता है।
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