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3 days ago
हमारा समाज कितना ज़्यादा पितृसत्तात्मक समाज है, ये बात तब समझ आती है, जब आप अपनी कमज़ोर होती स्थिति में केवल पुरुष होने के कारण निजात पा लेते हैं।

-चेतन डांगे (बाहर से भीतर)

किताब अमेज़न और फ़्लिपकार्ट पर उपलब्ध है। लिंक के लिए DM करें।

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Posted On: July 23rd 2026, 04:31 pm
हमारा समाज कितना ज़्यादा पितृसत्तात्मक समाज है, ये बात तब समझ आती है, जब आप अपनी कमज़ोर होती स्थिति में केवल पुरुष होने के कारण निजात पा लेते हैं।

-चेतन डांगे (बाहर से भीतर)

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Comments (2)
akchoubey06 2 days ago

akchoubey06

अन्याय का कोई लिंग नहीं होता। कभी पुरुष होने का लाभ मिलता है, तो कभी स्त्री होने का। इसलिए न्याय का तराज़ू किसी की पहचान से नहीं, उसके सच और उसकी परिस्थितियों से झुकना चाहिए। न विशेषाधिकार किसी का अधिकार होना चाहिए, न भेदभाव किसी की नियति। समाज तब परिपक्व होगा, जब पहचान नहीं, इंसानियत फ़ैसले करेगी।

ashwineemaurya_ 2 days ago

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