
2 days agoअन्याय का कोई लिंग नहीं होता। कभी पुरुष होने का लाभ मिलता है, तो कभी स्त्री होने का। इसलिए न्याय का तराज़ू किसी की पहचान से नहीं, उसके सच और उसकी परिस्थितियों से झुकना चाहिए। न विशेषाधिकार किसी का अधिकार होना चाहिए, न भेदभाव किसी की नियति। समाज तब परिपक्व होगा, जब पहचान नहीं, इंसानियत फ़ैसले करेगी।
