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बदलियों और ग्रहण के भय से ,
सूर्य निकलना नहीं छोड़ता ।
पतझड़ के भय से ,
कपोल उगना नहीं छोड़ते ।
तटों के उजड़ जाने के भय से ,
नदियाँ उफान नहीं छोड़ती ।
घोंसलों के उजड़ जाने के भय से ,
चिड़िया तिनका -तिनका लाना नहीं छोड़ती ।
नियति चाहे जो करा ले ,
पर जागृत मनुष्य कर्म नहीं छोड़ता ।
वैसे ही जैसे हम सभी जानते है मृत्यु होना तय है 
पर मृत्यु के भय से हम जीवन नहीं छोड़ते ।
“सविता” by @savitapradham
106
4 days ago
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अच्छी औरत होने का मैडल लेने के लिए जीवन ना खो देना क्योंकि ये मैडल औरत को केवल मरने के बाद ही मिलता है कि “अच्छी औरत थी “ by @savitapradham
143
6 days ago
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यकीन मानिए यदि आपको कुछ भी देना आता है तो आप दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों में से एक है ! चाहे आप किसी को वक़्त दे पायें , किसी को ढाँढस बंधा पाये , किसी की प्रशंसा कर पाये ,किसी को शब्दों से साहस दे पाये ,किसी के चेहरे पर मुस्कान की वजह बन पाए ,अपनी दशा अनुसार किसी की आर्थिक /शारीरिक / मानसिक मदद कर पाये और कुछ नहीं तो किसी को धैर्य पूर्वक सुन भी पाये तब भी आप दे ही रहें है और देता वो है जो अमीर होता है ! आर्थिक अमीरी कुछ और है और अगर आप आर्थिक रूप से सक्षम होकर भी कुछ भी देने का भाव रखते है तब भी आप अमीर ही हैं !

सबसे गरीब लोग वे है जो आलोचनाएं करते है , सुख-शांति छीनने का प्रयास करते है किसी का यश ,अपयश में बदलने में लगे रहते है ,किसी की स्वतंत्रता तक बाधित करते है ,मनोबल गिराते हैं ,दूसरों की सफलता में बाधक बनते है कुछ लोग तो किसी की सुख शांति से ही कुंठित हो पड़ते है कुल मिला कर कुछ ना कुछ छीनने का प्रयास करते है ऐसे लोग आर्थिक रूप से बेहद संपन्न भी हो सकते है और नहीं भी पर होते ये गरीब ही है !
तन-मन ,बुद्धि -संवेदना से संपन्न इंसान को तो बस देना आता है सिर्फ़ देना प्रेम/सम्मान/अर्थ /प्रशंसा/मनोबल /समय जो भी इनके पास उपलब्ध हो !
और मेरे जीवन का अनुभव कहता है आपका दिया हुआ ही आपके पास हज़ार गुना होकर लौट आता है बस ये जरूरी नहीं आपने जिसे दिया उसी से मिले ! व्यक्ति /वस्तु/स्थान बदल सकता है परंतु वापस मिलेगा जरूर जो भी आप देंगे ! ईश्वर का लेखा-जोखा बड़ा साफ़ और स्पष्ट है जो दोगे वही हज़ार गुना होकर आपको वापस मिलेगा !
तो अगली बार जब भी आप किसी को कुछ दें तो ध्यान रखें यही आपको हज़ार गुना होकर वापस मिलेगा ।
“सविता” by @savitapradham
121
8 days ago
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दूसरो को समझाने में वक्त क्यो जाया करते हो ,
ख़ुद को क्यो नहीं समझाते तुम !
दूसरो से मान पाने में क्यों हो इतना व्यस्त ,
ख़ुद का मान क्यों नहीं बढ़ाते तुम !
किसी और का प्रेम पाने भटक रहे यहाँ - वहाँ ,
ख़ुद से क्यों नहीं प्रेम कर पाते तुम !
बच्चे से जवान और जवान से बूढ़े हुए ,
दूसरों से रिस्ता निभाने की चाह में !
ख़ुद से क्यों नहीं रिस्ता निभाते तुम !
सुधारने ,बदलने निकले हो तुम हर किसी को ,
ख़ुद को क्यो नहीं बदल पाते तुम !
ख़ुशियों की तलाश में तो हो मगर ,
चाहत है कोई और दे , दे !
अपनी ख़ुशीयों की जिम्मेदारी ख़ुद क्यों नहीं उठाते तुम !
डर के जीते रहे और मर गए एक दिन 
ये सोच-सोच कर की चार लोग क्या कहेंगे !
अरे अपने अंदर के चार लोगो का क्यों नहीं सुन पाते तुम !
पाप -पुण्य सीखा है तुमने लोगो से !
अपनी आत्मा की आवाज सुन कर ,
सही-ग़लत का फ़ैसला क्यों नहीं ले पाते तुम !
जाओ मणिकर्णिका घाट में किसी दिन ,
देखोगे धू-धू करती चिताएं प्रति पल !
मरने से पहले क्यों नहीं जी पाते तुम !
“सविता” by @savitapradham
131
11 days ago
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 by @savitapradham
44
13 days ago
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पत्थर ने पत्थर होना नहीं चुना था !
पत्थर , पत्थर होने से पहले ,
नर्म नाजुक और मुलायम था ।
प्रकृति ने धीरे- धीरे उसे पत्थर बनाया ,
वर्षों के बदलाव से ,लावा से ,
पत्थर, पत्थर बन गया !
पत्थर ने कई बार इंकार किया होगा पत्थर होने से ,
पर प्रकृति के आगे भला किसकी चलती है ! 
पत्थर होने से पहले जब वह मिट्टी का कण था ,
उसमे नमी आती थी आद्रता रहती थी !
फिर स्थान,स्थति ,परिस्थिति ने उसे पत्थर बना दिया !
अब नमी ,आद्रता ,सूखना ,भीगना सब बाहर से हुआ !
पत्थर अंदर तक फिर पत्थर हुआ ।
पत्थर फिर पत्थर होकर मौन हुआ !
पत्थर ने फिर पत्थर होना स्वीकार किया ।
पत्थर अब चीखता चिल्लाता नहीं ,
पत्थर अब पत्थर होने का दर्द बताता भी नहीं !
पत्थर कभी तोड़ दिया जाता है ,
कभी किसी आकार में मोड़ दिया जाता है ,
पत्थर पर चलती है छैनी कटारी ,
पत्थर को कभी कोई देवता बना देता है !
पत्थर को कभी कोई मूरत बना लेता है !
पत्थर को कोई रास्ते में ठोकर लगा देता है !
पर किसी ने पत्थर का मर्म ना जाना ,
की शिवालय में जाकर जिसने उसे पूजा ,
किसी मूरत में सज़ा के उसे किसी कोने में रखा ,
या चलते रस्ते उसे किसी ने ठोकर लगाई ,
हर जगह बस पत्थर , पत्थर ही रहा !
लोग भूल गए की पत्थर अब पत्थर हो चुका है !
तुम उसे शिवालय में रखो देवालय में रखो ,
चरणों में रखो या हिमालय में रखो ,
पत्थर अब पत्थर ही रहेगा !
“सविता” by @savitapradham
164
20 days ago
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मैं नहीं हूँ राधा जैसी ,
जो बिन सम्मान प्रेमिका बस बन जाऊँगी !
मैं रुक्मणी जैसी भी नहीं जो बिन प्रेम ,
बस पत्नी कहलाऊँगी !
मैं सीता जैसी भी नहीं हूँ जो ,
अपना चरित्र बताने संसार को ,
अग्नि में चढ़ जाऊँगी !
मैं उर्मिला जैसी भी नहीं की तुम मुझे छोड़ ,
कर्तव्य निभाने जाओ ,
तो मैं वर्षों विरह में जल जाऊँगी !
मैं द्रौपदी जैसी भी नहीं की ,
हरले कोई चीर मेरा तुम्हारे आगे !
और फिर भी चरणों में मस्तक झुकाऊँगी !
मैं अहिल्या जैसी भी नहीं जो मुझे ,
अनजाने हुए अपराध के लिए पाषाण कर दे !
तो वर्षों किसी राम की प्रतीक्षा में ,
पाषाण ही रह जाऊँगी !
मैं नहीं यशोधरा जैसी भी की तुम,
आधी रात मुझे छोड़ ज्ञान की खोज में जाओ !
तो बस एक त्यागी हुई ,
अबोध शिशु की माँ ही रह जाऊँगी !

मैं सती जैसी हूँ प्रिय !
मुझे पाने तुमने तांडव किया !
तब ही “शिव” की “शक्ति” कहलाऊँगी ।
“सविता” by @savitapradham
143
22 days ago
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🥰🥰❤️❤️ by @savitapradham
53
a month ago
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मेरा कन्हैया ❤️❤️ by @savitapradham
45
a month ago
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“ज़्यादा जतन करना भी नहीं है जरूरी 
जिसे जाना हो उसे जाने दो” by @savitapradham
92
2 months ago
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❤️❤️😂😂🤣🤣 by @savitapradham
30
2 months ago
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स्वतंत्र रहे सब 
मान से अभिमान से 
उड़ें सब आसमान में 
हौसलों की उड़ान से 
परतंत्रता की खोले सब बेड़ियाँ 
जियें जीवन सारा स्वाभिमान से 
कोई भय ना हो कोई डर ना हो 
चले निर्भयता से शान से 
उन्मुक्त रहें सब देश वासी 
गर्व से भरे सब,इस पावन धरा की आन से ।

स्वत्रन्ता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 
“सविता” by @savitapradham
98
2 months ago
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