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मेरे पास कहने लायक कुछ न हो
मगर फिर भी मुझे सुना जा सकता है।।
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रात को जीत तो पाता नहीं लेकिन ये चराग़
कम से कम रात का नुक़सान बहुत करता है.

- इरफ़ान सिद्दीक़ी by @sunil__arya__
0
a year ago
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“मुझे आदमी का सड़क पार करना
हमेशा अच्छा लगता है
क्योंकि इस तरह
एक उम्मीद सी होती है
कि दुनिया जो इस तरफ है 
शायद उससे कुछ बेहतर हो
सड़क के उस तरफ।”

केदारनाथ सिंह by @sunil__arya__
3
a year ago
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No more space... by @sunil__arya__
5
a year ago
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ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है
ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई
- जौन एलिया by @sunil__arya__
5
2 years ago
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चल चल सही दो पल के लिए सही... by @sunil__arya__
6
3 years ago
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🌿🌿 by @sunil__arya__
2
3 years ago
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वो मेरे सामने, टेबल की दाहिनी तरफ की दूसरी कुर्सी पर बैठी थी। मेरे सामने वाली कुर्सी खाली थी। उसके हाथ में किताब थी। फटी हुई। वहां और भी लोग थे,सभी के खुसुर फुसुर से लाइब्रेरी गूंज रही थी। मगर वो बहुत बहुत तेज तेज बोल रही थी। एक दो बार लाइब्रेरी इंचार्ज ने फटकारा “ क्या तुम धीरे नहीं पढ़ सकती हो?"। उसने तपाक से जवाब दिया“ क्या तुम्हें नहीं दिख रहा है, मैं बहादुरी से लड़ रही हूं"। लाइब्रेरी इंचार्ज हैरान हो गई, और उससे भी ज्यादा मैं। मेरी नजर बार बार, उस किताब पर जा रही थी। मुझे देखना था, वह उसमें क्या पढ़ रही है। कुछ देर बाद मैंने खुद को सामने की कुर्सी पर पाया। उसका आधा सिर किताब में ही घुसा था। मेरे हाथ में भी किताब थी। मैंने धीरे धीरे उसके किताब में झांकने की कोशिश करने लगा। उसकी किताब में कुछ नही लिखा था। उसने मुझे, उसकी किताब में झांकते हुए देख लिया, मैंने अपना सर वहां से हटाया और अपनी किताब में घुसा दिया।“ क्या उसने मुझे देख लिया होगा? हां, देख ही लिया होगा।"
उसने पलटकर मेरी तरफ देखा, फिर मेरी किताब को देखा।
“तुमने किताब उलटी पकड़ी है”। उसने कहा।
“ ओह! हां"।
इतना कहकर वापस वो अपनी किताब में उसने सिर घुसा दिया।
“ इसमें कुछ नहीं लिखा। तुम कहां बहादुरी से लड़ रही हों"। मैंने कहा।
उसने मेरी तरफ पलटकर कहा “ क्या तुम अंधे हो?"। 
मैं फिर हैरान। उसने एकदम से कहा “मैं हमेशा से बहुत कुछ लिख देना चाहती हूं। तमाम कविताऐं, कहानियां को। उन्हें तुम्हारे कोमल पगथलियों के नीचे बिछा देना चाहती हूं। लेकिन तुम वो नहीं हो। तुम कौन हो?"। 
“मैं? मैं अधर हूं। तुम?"। मैंने कहा।
“मैं अवंतिका।"
“तुम मुझे बता सकती हों। मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी”। मैंने कहा।
वह मेरी तरफ मुस्कुराई।
“इन दिनों कई रातें सोकर बिताई, ओर कई रातें सो नहीं पायी। उन कविताऐं, कहानियां पढ़ लिख लेने के बावजूद भी। मैंने कई बार सपना देखा है कि मैं किसी बड़े से पेड़ की छाया तले सोई हूं। और घर की जमीन पर किताबें बिखरी पड़ी है। तब मैनें कई बार तुम्हें मेरे घर में छुपते छिपाते आते देखा है। मैं जब नहाती हूं, पीठ पर साबुन मलते हुए तुम्हारी अनुपस्थिति में भी उपस्थिति दर्ज करती हूं। इस सोशल मीडिया के जमाने में खत लिखना चाहती हूं।लंबे समय से कुछ भी नहीं लिख पा रही हूं तो अपने को भीतर से खाली खाली महसूस कर रही हूं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आखरी बार तुम्हें जाते हुए देख अलविदा नहीं कहने पर बहुत देर तक स्तब्ध खड़ा रही थी। मानो जैसे लगा उस गली के अगले  ही मोड़ से मुड़कर देखोगे।”

( बाकी कॉमेंट में..) by @sunil__arya__
11
4 years ago
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 by @sunil__arya__
2
4 years ago
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हर लिखने वाले की आदत है कि वो अपना कमरा कभी साफ़ नहीं करना चाहता है, वह अपना कमरा साफ़ करना भी चाहता है पर एक भी चीज़ एक जगह से दूसरी जगह टस से मस किए बगैर। उसका कमरा आखरी बार जब किसी ने साफ़ किया होगा या तो वो उसकी मां होगी या उसकी हमसफर....साथिनी। मुझे कुछ समय बाद ही पता लग गया था कि मेरे लिए सब कुछ क्षणिक है दुःख, सुख, प्रेम, नफरत, परेशानियां, दोस्त, दोस्ती, रिश्ते। मैंने लिखना कब का छोड़ दिया था। बस जो जिए जा रहा था और उस जिए हुए से रश्क कर रहा था वो मैं था। जो लिख रहा है, लिखता है वो मैं कतई नहीं हूं।
मुझे आश्चर्य होता है कि इस मेरे घर, मेरे साथ रहने वाले आदमी ने, जो मेरी तरह दिखता है। उसने मेरे पूरा घर में, चारदिवारियों पर, खिड़कियो पर, छत पर,बिस्तर पर, पंखे पर, कुछ न कुछ लिख दिया है। और लिखता रहता है। उसने बाहर लगे पेड़ पर भी लिख दिया है कि-
“तुम जीवित थे,
जीवित हो, 
जीवित रहोगे,
तुम्हें काट दिए जाने
पर भी तुम्हारी सौ जड़े
उग आयेगी,
जमीं से नहीं तो मुझसे"।
और ये लिखा साफ मेरी खिड़की से दिखाई पड़ता है। उस खिड़की से मुझे मेरा आसमान दिखाई पड़ता है, जिसमें उड़ने के लिए, और एक कमरे जीतना घर, जीने के लिए काफ़ी हद तक ठीक है। बस जीना ही तो है। रात बेहद गहरी हो चली है, इस रात में बहुत कुछ नीरस लग रहा है, दिन दहाड़े सड़कों पर आया शोर अब अब चारदीवारियों में जा पसरा है। आसमान में साफ़ साफ़ देख सकता हूं, टेबल पर रखे लैंप की रोशनी के नीचे सिगरेट का ठूंठ बुझाते, मैं हिलती डुलती कुर्सी पर बैठ ऊपर देखता तो कभी उस पेड़ को, कभी सड़क पर दौड़ती गाड़ियों को,कभी ऊपर ज़ोर से टिमटिमाते हुए तारें को, अचानक से उस तारें को देखते हुए मुझे खुशबू आने लगी, उसके नाम की। वैसे तो यह खुशबू मुझे अपनी किस्से कहानियों की तितलियों से, पेड़ पौधों से, और उसकी जैसी दिखने वाली भीड़ से आती।
यह बात तब की है जब मेरी पहली पहली नौकरी में उससे मुलाकात हुई, मुलाकात तो उससे करीब 1 साल पहले ही हो गई। हम दोनो अपने अपने भविष्य की चिंता में लीन थे, ज्यादा बातें नहीं, बस बैठ जाते और मन ही मन बतलाना। पर उस वक्त लगा, जैसे पहली बार मिलें, मिलें भी इस तरह की मैं अपनी कहानियां लोगो के पास जाकर ढूंढता, और ढूंढते ढूंढते खो जाता, खो जाने के बाद या तो किसी स्टेशन की सीढ़ियों पर, या किसी को वही कहानी सुना देने पर वो मुझे अपने पते पर छोड़ देते। पहली मुलाकात में ही उससे मुझे खुशबू आने लगी थी।

Pic- google 
@imsunil_arya by @sunil__arya__
2
4 years ago
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 by @sunil__arya__
2
5 years ago
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ब्रह्मांड में कितना कुछ अनंत है
कितने सारे ग्रह है,
एक है तो प्रथ्वी जिस पर
तुम और मैं। 
तुम और मैं के बीच पड़ता है
एक शहर जो इतवार को खुलता है
हम दोनो के लिए।
ट्रेन पकड़कर आना और बस 
बोल सकने पर भी मौन होना।
.

ब्रह्मांड में कितना कुछ अनंत है
कितने सारे उल्कापिंड है,
जो कभी आए, टकराए व फैल 
जाए पूरे बदन पर सारे उल्कापिंड।
कठोर और कठोर बना दे मेरी पीठ 
और छाती को।
.

ब्रह्मांड में कितना कुछ अनंत है
कितने सारे अनगिनत तारे है,
जिन्हें मैं गिनता हूं बिस्तर पर
लेटा लेटा जब ठीस सी उठती है।
मेरे हिस्से कभी न आते वो तारे जो टूट
जाते है जिसे देख मैं कर सकूं 
तुम्हें पा सकने की मिन्नते।

.

ब्रह्मांड मैं कितना कुछ अनंत है
कितना विशालकाय स्पेस है
इतना विशालकाय स्पेस होने के 
बावजूद ये छोटा रह गया।
तुम्हारे आलिंगन से, मेरे कमरे से,
मेरे आंगन से।
.

ब्रह्मांड में कितना कुछ अनंत है
कितनी सारी आंखे है ब्रह्मांड 
में जो उसे देखती होगी।
केवल एक ही आंखे है
जिसमें पूरा ब्रह्मांड समाया हुआ है।
तुम्हारी आंखों में ही वो सारे ग्रह,
सारे उल्कापिंड, सारे अनगिनत तारों
का समूह।
तुम्हारी आंखों में है झरना जो 
उल्कापिंड द्वारा पत्थर बन चुकी 
उंगलियों पर से बहता है तो वहां घास उग आती है।

अभी अभी तुम्हारी आंखों में देखते हुए 
पता लगा की 
ब्रह्मांड में कितना कुछ अनंत है।

#hindipoetry #hindiyugm #hindipanktiyaan #hindiwriting #divyaprakashdubey #kavitayen by @sunil__arya__
6
5 years ago
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No caption 😉 by @sunil__arya__
0
5 years ago
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