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“Between chapters and chai, I find the stories worth sharing.”
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Maybe books aren’t keeping me away from life.

Maybe they’re teaching me how to look at it.
To question what everyone accepts.
To notice what everyone overlooks.
To ask who I am beneath everything I’ve been told to be.

#Philosophy #Bookstagram #BookLover #books #reading
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क्या आपने कभी विचार किया है कि आपकी थाली में रखा एक साधारण-सा निवाला अपने साथ कितनी सदियों का इतिहास लेकर आया है? जिस चाय को हम अपने दैनिक जीवन का लगभग अनिवार्य भाग मानते है, उसके पीछे व्यापार, औपनिवेशिक लालच और सत्ता की एक लंबी कहानी है। जिस केले को हम रास्ते में चलते-फिरते खा लेते हैं, वह दुनिया के बड़े रिटेल बाजारों में सबसे अधिक बिकने वाली वस्तुओं में सम्मिलित है। और जिस भोजन को हम अक्सर केवल स्वाद, भूख और पसंद का मामला समझते हैं, वह हमारी जाति, संस्कृति, पहचान और राजनीति तक का पता बता सकता है। तो फिर प्रश्न यह है कि क्या हम वास्तव में खाना खाते हैं, या खाना भी हमें बहुत कुछ खिला रहा होता है इतिहास, संस्कृति, राजनीति और कभी-कभी हमारे अपने पूर्वाग्रह? यह पुस्तक इसी प्रश्न पकड़ती है। संभवतः इसी कारण ‘इतिहास की थाली’ पढ़ते हुए धीरे-धीरे अपनी ही थाली को देखने का दृष्टिकोण परिवर्तित होने लगता है।

यह पुस्तक भोजन पर लिखी गई है, लेकिन केवल भोजन पर ही नहीं है। लेखक रसोई से निकलकर इतिहास में जाता है, इतिहास से बाजार में, बाजार से राजनीति में और फिर वापस हमारी थाली तक लौट आता है। कभी किसी व्यंजन की कहानी के बहाने सदियों पुरानी यात्रा खुलती है, तो कभी कोई मामूली-सी खाद्य वस्तु वैश्विक व्यापार और सत्ता के चरित्र का दर्पण बन जाती है। यह तय कौन करता है कि हमें क्या चाहिए? हम? या वह विज्ञापन जिसे हम दिन में बीस बार देखते हैं?

विशेष बात यह है कि लेखक यह सब किसी भारी-भरकम अकादमिक बोझ के साथ नहीं करता। भाषा वार्तालाप करती है। पाठक को ऐसा नहीं लगता कि सामने कोई इतिहास का प्रोफेसर बैठा है। अपितु ऐसा लगता है जैसे कोई दिलचस्प किस्सागो बैठा है और हर कुछ देर बाद कह रहा है, “रुकिए, यह कहानी तो सुनते जाइए।” यही इस पुस्तक की पठनीयता का रहस्य है। ‘इतिहास की थाली’ में इतिहास है, समाजशास्त्र है, राजनीति है, अर्थव्यवस्था है, संस्कृति है, स्मृतियाँ हैं, व्यंजन हैं और सबसे बढ़कर जिज्ञासा है।

कुछ तथ्य तो ऐसे हैं कि पढ़ते-पढ़ते आपका अपना सामान्य ज्ञान भी आपको थोड़ा संदिग्ध लगने लगे। जैसे चीन में सदियों पहले ऐसा व्यंजन बन चुका था जिसे आज के बर्गर से मिलती-जुलती चीज़ माना जा सकता है? चाय की कहानी में द्वारकानाथ टैगोर और असम के शुरुआती चाय बागानों की कहानी आती है, और अचानक हमारी कप में पड़ी चाय केवल चाय नहीं रह जाती। वह इतिहास बन जाती है।

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